मंगलवार, 7 मई 2024

दिवाने मन का विकल्प



रोनिता और प्रदीप की शादी के 14 बरस से भी ज्यादा समय बीत चुके थे| इतने समय में दोनों ही 02 बच्चों के माता-पिता बनकर सामान्य तरीके से अपने जीवन की गाड़ी को ठीक तरीके से चला रहे थे| किन्तु, विगत कुछ दिनों से प्रदीप कुछ ज्यादा ही व्यस्त होने लगे थे यहाँ तक की रविवार के दिन भी| आज पूरे दिन बारिश होती रही थी| अभी थोड़ी देर पहले ही आसमान से पानी बरसना बंद हुआ था, लेकिन तेज हवा की सरसराहट अब भी सुनाई पड़ रही थी जो माहौल को रोमांटिक बनाने के लिए काफी थी|
इस मनभावन मौसम में इधर रोनिता बंद खिड़की के सामने खोई खोई सी खड़ी होकर शीशे से बाहर देखते हुए राहुल के बारे में सोच रही थी, पता नहीं वह इस मौसम में कहां है? और उधर प्रदीप टीवी पर कभी गाने सुन रहा था, तो कभी न्यूज| वह आराम के मूड में भी था| उसने वहीं से आवाज दी, ‘‘रोनिता, क्या सोच रही हो खड़े खड़े?’’
‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बाहर देख रही हूं, अच्छा लग रहा है|’’ रोनिता ने अनमने ढंग से जवाब दिया|
‘‘यश और समृद्धि कब तक आएंगे?’’
‘‘बस, दोनों आने ही वाले हैं| मैं उन के लिए कुछ बना लेती हूं,’’ कह कर रोनिता किचन में चली गई|
रोनिता और प्रदीप के युवा बच्चे यश और समृद्धि अपनी-अपनी पढ़ाई और दोस्तों में व्यस्त हुए तो रोनिता के जीवन में खालीपन ने आहट दे दी| वह हमेशा प्रदीप से अपने अकेलेपन की चर्चा करती, ‘‘प्रदीप, आप भी काफी व्यस्त रहने लगे हैं, बच्चे भी बिजी हैं, आजकल कहीं मन नहीं लगता, शरीर घर-बाहर के सारे कर्त्तव्य तो निभाता चलता है, लेकिन मन में एक अजीब वीराना सा भरता जा रहा है क्या करूं?’’
हमेशा की तरह प्रदीप हर बार रोनिता को समझाता, ‘‘समझ रहा हूं तुम्हारी बात, लेकिन पद के साथसाथ जिम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही हैं. तुम भी किसी शौक में अपना मन लगाओ न’’ ‘‘रोनिता, इस में अकेलेपन की क्या बात है| यह तो तुम्हारे हाथ में है, तुम अपनी सोच को जैसे मरजी जिधर ले जाओ| अकेलापन देखो तो कहां नहीं है? आजकल फर्क बस इतना ही है कि कोई बूढ़ा हो कर अकेला हो जाता है, कोई थोड़ा पहले| अगर इस सचाई को मन से स्वीकारो तो कोई तकलीफ नहीं होती और हां, तुम्हें तो पढ़नेलिखने का इतना शौक था न! तुम तो कालेज में लिखती भी थी| अब समय मिलता है तो कुछ लिखना शुरू करो|’’ मगर रोनिता को अपने अकेलेपन से इतनी आसानी से मुक्त होना मुश्किल लगता|
इसी रफ्तार से चलती जा रही रोनिता और प्रदीप की ज़िंदगी में प्रदीप के प्रिय मुकेश दोस्त के छोटे भाई राहुल को एमबीए में नामांकन के बाद होस्टल में रहने का प्रबंध नहीं हो पाया तो मुकेश ने प्रदीप से फोन पर कहा, ‘‘यार, उसे कहीं अपने आसपास ही कोई कमरा दिलवा दे, घर में भी सब लोगों की चिंता कम हो जाएगी|’’
प्रदीप ने जब यह बात रोनिता को बताई तो उसे एक आशा की किरण दिखी| उसने सोचा कि चलो शायद राहुल की मदद से उसका खालीपन कम हो जाए| प्रदीप ने रोनिता से विचार विमर्श किया, ‘‘क्यों न राहुल को ऊपर का कमरा दे दें? अकेला ही तो है, दिन भर तो कालेज में ही रहेगा केवल शाम को सोने भर का नाता ही रहेगा उसका’’
रोनिता को कोई आपत्ति नहीं थी| अत: आपसी सहमति के बाद राहुल को ऊपर वाला कमरा देना तय हुआ| नामांकन की प्रक्रिया आदि पूरी करने के उपरांत राहुल अपना बैग लेकर आ गया| अपने हंसमुख स्वभाव की वजह से वह जल्दी सब से हिलमिल गया| राहुल प्रायः ही रोनिता को अपनी बातों से इतना हंसाता कि रोनिता तो जैसे फिर से जी उठी| बातचीत में जब राहुल उस से कहता कि ‘‘कौन कहेगा आप यश और समृद्धि की मां हैं, बड़ी बहन लगती हैं उन की!’’ तब रोनिता अपनी उम्र के 40वें साल में एक नवयुवक से अपनी प्रशंसा सुन कर जैसे नए उत्साह से भर जाती|
प्रतिस्पर्द्धा से भरपूर इस युग में विगत कई दिनों से प्रदीप अपने पद की बढ़ती जिम्मेदारियों में व्यस्त होता चला गया था और अब बस नाश्ते के समय हीं बात-मुलाक़ात हो पाती| उस समय भी प्रदीप बस हां हूं करता जल्दी-जल्दी पेपर पर नजर डालता बैग उठाता और चला जाता| ऑफिस से रात को आता तो कभी न्यूज, कभी लैपटौप, तो कभी फोन पर व्यस्त रहता फिर भी रोनिता उस के आगेपीछे घूमती रहती, इंतजार करती रहती कि कब प्रदीप कुछ रिलैक्स हो कर उस की बात सुनेगा क्यूंकी वह अपने मन की कई बातें उस के साथ बांटना चाहती थी किन्तु, प्रदीप की जिम्मेदारियों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रही थी|
घर परिवार की इन्हीं परिस्थितियों में घिरी रोनिता के दिमाग ने अब अकेले में राहुल के संदर्भ में सोचना शुरू करने लगा| इससे रोनिता को उसके मन के एक खाली कोने के भरे जाने की सी अनुभूति होने लगी| अब जब प्रदीप टूर पर रहता तो राहुल कालेज से आते ही कहता, ‘‘भैया गए हुए हैं, आप बोर हो रही होंगी| आप चाहें तो बाहर घूमने चल सकते हैं| यश और समृद्धि को भी ले चलिए|’’
रोनिता कहती, ‘‘वे तो कोचिंग क्लास में हैं| देर से आएंगे| चलो, हम दोनों ही चलते हैं| मैं गाड़ी निकालती हूं|’’
फिर दोनों बाहर निकल जाते और घूमफिर कर खाना खा कर ही आते| इस दौरान रोनिता कभी भी और कहीं भी राहुल को अपना पर्स कहीं निकालने नहीं देती| राहुल उस के जीवन में एक ताजा हवा का झोंका बन कर आया था| दोनों की दोस्ती का दायरा बढ़ता गया| वह अकेलेपन की खाई से निकल कर नई दोस्ती की अनुभूति के सागर में गोते लगाने लगी| अब वह अपनी उम्र को भूल कर किशोरियों की तरह दोगुने उत्साह से हर काम करने लगी| अब तो न चाहते हुए भी प्रदीप के साथ अंतरंग पलों में भी राहुल की चहकती आवाज से घिरने लगती|
अचानक एक दिन राहुल कालेज से मुंह लटकाए आया| रोनिता ने खाने के लिए पूछा तो उस ने मना कर दिया. वह चुपचाप ड्राइंगरूम में ही गुमसुम बैठा रहा| रोनिता ने बारबार पूछा तो उस ने बताया, ‘‘आज कालेज में मेरा मोबाइल खो गया है| यहां आते समय विजय भैया ने इतना महंगा मोबाइल ले कर दिया था| भैया अब बहुत गुस्सा होंगे|’’ रोनिता चुपचाप सुनती रही| कुछ बोली नहीं| लेकिन अगले ही दिन उस ने अपनी जमापूंजी से 15 हजार रुपए निकाल कर राहुल के हाथ पर जबरदस्ती रख दिए| राहुल मना करने लगा, लेकिन रोनिता के जोर देने पर रुपए रख लिए|
प्रदीप भी कभी कभार फुरसत मिलते ही राहुल के हालचाल पूछता, वैसे उस के पास समय ही नहीं रहता था| वह रोनिता पर घर-गृहस्थी पूरी तरह से सौंप कर अपने काम में लगा रहता था| रोनिता मन ही मन पूरी तरह राहुल की दोस्ती के रंग में डूबी हुई थी| पहले उसे प्रदीप में एक दोस्त नजर आता था, अब उसे प्रदीप में एक दोस्त की झलक भी नहीं दिखती| अब यह झलक उसे राहुल में दिखाई देने लगी थी क्योंकि वह उस की बातों में रुचि लेने लगा था, उस के शौक ध्यान में रखता है, उस की पसंद-नापसंद पर चर्चा करता है|
एक दिन प्रदीप टूर पर था| यश और समृद्धि किसी बर्थडे पार्टी में गए थे| अंधेरा हो चला था| राहुल भी अभी तक नहीं आया था| रोनिता लौन में टहल रही थी| राहुल आया, नीचे सिर किए हुए मुंह लटकाए ऊपर अपने कमरे में चला गया| रोनिता को देख कर भी रुका नहीं तो रोनिता को उस की फिक्र हुई| वह उस के पीछे-पीछे ऊपर गई| जब से राहुल आया था वह कभी उस के रूम में नहीं जाती थी| मेड ही सुबह सफाई कर आती थी| उस ने जा कर देखा राहुल आंखों पर हाथ रख कर लेटा है| रोनिता ने पूछा, ‘‘क्या हो गया, तबीयत तो ठीक है?’’ राहुल उठ कर बैठ गया| फिर धीमे स्वर में बोला, ‘‘मैं ठीक हूं’’ ‘‘तो रोनी सूरत क्यों बनाई हुई है भाई?’’ क्या बात है साफ-साफ बताओ|
‘‘भैया ने बाइक के पैसे भेजे थे, मेरे दोस्त उमेश की बहन की शादी है, उसे जरूरत पड़ी तो मैं ने उसे सारे रुपए दे दिए| अब भैया बाइक के बारे में पूछेंगे तो क्या कहूंगा? कुछ समझ नहीं आ रहा है| वही उमेश याद है न आप को| यहां एक बार आया था और मैं ने उसे आप से भी मिलवाया था|’’
‘‘हां हां याद आया,’’ रोनिता को वह लड़का याद आ गया जो उसे पहली नजर में ही कुछ जंचा नहीं था| बोली, ‘‘अब क्या करोगे?’’
‘‘क्या कर सकता हूं? भैया को तो यही लगेगा कि मैं यहां आवारागर्दी कर रहा हूं, वे तो यही कहेंगे कि सब छोड़ कर वापस आ जाओ, यहीं पढ़ो|’’
राहुल के जाने का खयाल ही रोनिता को सिहरा गया| फिर वही अकेलापन होगा, वही बोरियत अत: बोली, ‘‘मैं तुम्हें रुपए दे दूंगी|’’ ‘‘अरे नहीं-नहीं, यह कोई छोटी रकम नहीं है|’’ ‘‘कोई बात नहीं, मेरे पास बच्चों की कोचिंग की फीस रखी है| मैं तुम्हें दे दूंगी|’’ ‘‘लेकिन मैं ये रुपए आप को जल्दी लौटा दूंगा|’’
‘‘हां-हां, ठीक है| मुझ से कल रुपए ले लेना| अब नीचे आ कर खाना खा लो|’’
यह कहकर रोनिता नीचे आ गई| उसने अपनी अलमारी खोली| सामने ही रुपए रखे थे| सोचा अभी राहुल को दे देती हूं| उसे ज्यादा जरूरत है इस समय| बेचारा कितना दुखी हो रहा है| अभी जा कर पकड़ा देती हूं| खुश हो जाएगा| वह रुपए ले कर वापस ऊपर गई| राहुल के कमरे के दरवाजे के बाहर ही उस के कदम ठिठक गए|
अपने कमरे में राहुल फोन पर किसी से धीरेधीरे बात कर रहा था| न चाहते हुए भी रोनिता ने कान उस की आवाज की तरफ लगा दिए| वह कह रहा था, ‘‘यार उमेश, मोबाइल और बाइक का इंतजाम तो हो गया| सोच रहा हूं अब क्या मांगूगा? अमीर औरतों से दोस्ती करने का यही तो फायदा है, उन्हें अपनी बोरियत दूर करने के लिए कोई तो चाहिए और मेरे जैसे लड़कों को अपना शौक पूरा करने के लिए कोई चाहिए|’’
‘‘मुझे तो यह भी लगता है कि थोड़ी सब्र से काम लूंगा तो वह मेरे साथ सो भी जाएगी| बेवकूफ तो है ही… सबकुछ होते हुए भटकती घूमती है| मुझे क्या, मेरा तो फायदा ही है उस की बेवकूफी में|’’
राहुल की यह बात सुनकर रोनिता भारी कदमों से नीचे आ कर कटे पेड़ सी बैड पर पड़ गई| उसे लगा कभी-कभी इंसान को परखने में मात खा जाती है नजरें| पहले तो उसे स्वयं पर बड़ी शर्म आई| इतने दिनों से वह राहुल जैसे चालाक इंसान के लिए बेचैन रहती थी, सही कह रहा था राहुल| वही बेवकूफी कर रही थी| अकेलेपन के एहसास से उस के कदम जिस राह पर बढ़ चले थे, अगर कभी प्रदीप और बच्चों को उस के मन की थाह मिल जाती तो क्या इज्जत रह जाती उस की उन की नजरों में|
तभी प्रदीप की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘अकेलेपन से हमेशा दुखी रहने और नियति को कोसने से तो अच्छा है कि हम चीजों को उसी रूप में स्वीकार कर लें जैसी वे हैं| तुम ऐसा करोगी तभी खुल कर सांस ले पाओगी|’’
इस बात का ध्यान आते ही रोनिता को कुछ शांति सी मिली| उस ने कुदरत को धन्यवाद दिया, उम्र के इस मोड़ पर अभी इतनी देर नहीं हुई थी कि वह स्थिति को संभाल न सके| वह कल ही राहुल को यहां से जाने के लिए कह देगी और यह भी बता देगी वह इतनी बेवकूफ नहीं कि अपने पति की कमाई दूसरों की भावनाओं से खेलने वाले लड़के पर लुटा दे|
अभी से वह अपने जीवन के पुस्तक की इस दुखांत अध्याय को सदा के लिए बंद कर रही है ताकि वह अपने जीवन की नई शुरुआत कर सके| कुछ सार्थक करते हुए जीवन का शुभारंभ करने का प्रयत्न तो वह कर ही सकती है| अब रोनिता कभी भी कहीं भी नहीं भटकेगी| इसी विचार के साथ क्रोध, घृणा, अपमान और पछतावे के मिलेजुले आंसू उस की आंखों से बह निकले| जिसने उसके मन के सारे मेल धो डाले| अब रोनिता के मन में कोई दुविधा नहीं थी|
अब रोनिता ने यह तय कर लिया था कि वह जिएगी अपने स्वयं के सजाए संवरे लमहे और अपनी खुद की नई पहचान के साथ| उसके अचानक मन की सारी गांठें खुल गई थीं जो यही सही विकल्प था उसके दीवाने मन का..

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