आरव और रुचिका शादी से पहले एक अच्छे दोस्त और शादी के बाद एक आदर्श पति-पत्नी थे| दोनों ही एक दूसरे को बेहद प्यार करते थे| अभी उनकी शादी को केवल 05 ही साल हुए थे और दोनों में अन-बन शुरू हो गई थी| इसका कारण आरव का पढ़ाई के प्रति ज्यादा लगाव बढ़ना था| आरव जल्दी से अपनी पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी फैक्ट्री लगाना चाहता था| वह यह भी चाहता था कि रुचिका उसकी मालकिन बने|
विगत तीन दिनों से आरव और रुचिका की बातचीत बंद थी और घर का माहौल तनाव भरा था| कल की रात, आरव ने खुशी से अपनी पत्नी रुचिका के लिए एक साड़ी लाई थी। वह उसे टेबल पर रखकर सो गया। रुचिका ने उसे देखा था, लेकिन उस वक्त उसने उसे छूने का साहस नहीं किया था। अगले सुबह, रुचिका जब घर की सफाई कर रही थी, टेबल पर रखी साड़ी के पास एक चिट्ठी देखी। वह जल्दी से चिट्ठी को उठाकर पढ़ने लगी। उसमें लिखा था:
"मेरी प्यारी रुचिका,
गुस्से में देखकर तुम्हें एक अजीब सा सुख मिलता है, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं घर थोड़ी देर से लौटू तो तुम ज्यादा गुस्सा नहीं करती हो, लेकिन जब मैं देर से घर लौटता हूँ तो तुम मुझे डाँटती हो, और मुझे वो डाँटना बहुत अच्छा लगता है। मुझे चाहिए कि मैं तुम्हें अपनी बाहों में लपेट लूं, लेकिन मैं इतना रोमांटिक नहीं हूं, मैं बस पढ़ाई और काम में इतना व्यस्त हूं कि मैं तुम्हें ठीक से ध्यान नहीं दे पाता।
मुझे यह तो पता नहीं कि तुम मुझे किस अनजान कारण से इतना प्यार करती हो, लेकिन जो भी हो मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं। मैं सुबह जल्दी उठता हूं ताकि मैं सूर्य को देख सकूं, मुझे रोशनी पसंद नहीं, लेकिन मैं रोशनी के बिना तुम्हें नहीं देख सकता, इसलिए मैं हमेशा रोशनी के सामने अपना सिर झुकाता हूं। खैर, छोड़ो इस सब बातों को, कल मैंने तुम्हारे लिए एक साड़ी लाई थी, जिसे मैंने तुम्हें नहीं दिया, क्योंकि यह तुम्हें पसंद नहीं आई थी, लेकिन अब जब तुम इस चिट्ठी को पढ़ोगी, तो मैं जानता हूं कि तुम वो साड़ी अपने हाथों में लोगी।"
आरव की चिट्ठी पढ़कर, रुचिका के होठों पर हल्की मुस्कान खिल उठी और आंखों ने भी बरसने की असफल कोशिश की। उसने आरव के पत्र को दुबारा से और ठीक से पढ़ा। उसे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन उसे आरव पर कहीं अपने से अधिक भरोसा था।
पत्र पढ़ने के बाद वह सोचने लगी कि, क्या आरव वास्तव में इतना रोमांटिक है जैसा कि वह सपनों में सोचती थी? शायद आरव का प्यार उसके अंदर छुपा हुआ था। रुचिका को आरव की चिट्ठी को पढ़कर साड़ी पहनने की इच्छा होने लगी और उसने साड़ी पहन भी ली। थोड़ी देर बाद दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई।
रुचिका ने जल्दी से दरवाजा खोला। आरव ने रुचिका को साड़ी में देखकर हैरानी जताई, लेकिन फिर उसने समझ लिया कि वह सही दरवाजे पर है। उसने रुचिका को बड़े ध्यान से देखा, और फिर अपने घर के अंदर चला गया। रुचिका को लगा कि, आरव को जैसे हर दिन उसी हालत में देखने की आदत हो गई है। वह नहीं समझ पा रही थी कि उसने उसे चाहकर भी पहले क्यों नहीं समझा।
डेली रूटीन के तहत आरव खाना खाकर अपने बिस्तर पर लेट गया। फिर दुबारा से रुचिका के द्वारा दरवाजा खटखटाया गया। अब आरव ने भी समझ लिया कि रुचिका ही आई है। रुचिका के अंदर आते ही, आरव ने उसे तिरछी नजरों से देखा, और समझा कि कुछ गलती हुई है। रुचिका कमरे में आकर चुपचाप बैठ गई। उसने बार-बार अपने आप को देखा और नजरे चुराकर बीच बीच में कभी कभी आरव को देखती रही कि क्या कुछ गड़बड़ हो गया है।
कुछ देर तक बैठने और कमरे में अन्य काम करने के बाद, जब काम पूरा हो गया, उसने आरव से जाने की इजाजत ली। इस तरह यहाँ से उन दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई| इसतरह से बातचीत के दौरान रुचिका ने आरव के प्रति अपना अन्याय बताया और उसने उसे अपनी बाहों में ले लिया।
आरव ने भी मन ही मन लगभग तैयार ही बैठा था और बस रुचिका की एक पहल का इंतजार कर रहा था| उसने तुरंत ही रुचिका को धीरे से अपनी बाहों में लिया और उसे गले लगा लिया। हालांकि रुचिका को यह सब अचानक लगा, लेकिन उसे बहुत अच्छा भी महसूस हो रहा था। आरव की दिल से निकली हुई इस भावना को देखकर, रुचिका का दिल भी खुशी से भर गया।
रुचिका ने भी आरव को अपनी बाहों में कस लिया और उसको गहरी चुम्बनों से भर दिया। आरव ने उसे भी गले लगा लिया और उन्होंने मिलकर दोनों प्यार का आनंद लिया, बिना किसी शब्द के। इस रोमांटिक क्षण के बाद, आरव ने कामरे की लाइट बंद की और उन दोनों ने एक-दूसरे के साथ बिताए हुए पलों का प्यार में डूबकरआनंद लिया।

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